कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत लोककला शैली भांड पाथेर

भांड पाथेर कश्मीर की लोक कला शैली है जोकि अच्छी खासी प्रचलन में भी है। सदियों से कश्मीर के लोग अपना मनोरंजन इस नाटकीय शैली के माध्य़म से ही करते आ रहे है । जब प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का चलन बिल्कुल नहीं था तब उस समय कश्मीरी समाज में सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संदेश प्रसारित करने का अपना ही एक अलग अनोखा तरीका था । व्यंग्यात्मक लहजे में पेश की जाने वाली कश्मीर की लोक कला 'भाड़ पाथेर',राजनीतिक प्रतिरोध और ज्वलन्त मुद्दों को अपने अनोखे अंदाज में उठाने का काम सदियों से करता आया है।

कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत लोककला शैली भांड पाथेर

श्रीनगर: जब देश में जनसंचार के आधुनिक माध्यम नहीं थे, तब लोग लोक कला और सांस्कृतिक नाटको के माध्यम से अपना संदेश एक दूसरे तक पहुंचाते थे । कश्मीर में भी पांरपरिक लोक नाटकीय शैली भांड पाथेर कहीं न कहीं आज भी कश्मीर में जिन्दा है और पारंपरिक भांड प्रजाति के जीविका का एकमात्र साधन है। क्या है भांड पाथेर की कहानी उसके बारें में पढ़िए हमारी इस खास रिपोर्ट में,

भांड पाथेर कश्मीर की लोक कला शैली है जोकि अच्छी खासी प्रचलन में भी है। सदियों से कश्मीर के लोग अपना मनोरंजन इस नाटकीय शैली के माध्य़म से ही करते आ रहे है । जब प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का चलन बिल्कुल नहीं था तब उस समय कश्मीरी समाज में सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संदेश प्रसारित करने का अपना ही एक अलग अनोखा तरीका था । व्यंग्यात्मक लहजे में पेश की जाने वाली कश्मीर की लोक कला 'भाड़ पाथेर',राजनीतिक प्रतिरोध और ज्वलन्त मुद्दों को अपने अनोखे अंदाज में उठाने का काम सदियों से करता आया है। मुगल किस्से कहानियों को प्रस्तुत करना हो या फिर पौराणिक उपन्यास के मर्म को आवाम तक पहुंचाना हो, वहीं आज के समय में कोरानावायरस के प्रति जागरूपता फैलाने के लिए भी कश्मीर में जिस रंगमंच का इस्तेमाल होता है उसका नाम है भांड पाथेर, समाज के दर्पण के रूप में काम करने वाली कश्मीरी शैली आज भी उतनी ही लोगों के मन पर उतनी ही गहरी छाप छोड़ती है।

भांड पाथेर में प्रदर्शन करने वाले कलाकार भांड होते हैं और उनके द्वारा किए जाने वाले नाटकों को पाथेर कहा जाता है। भांड पाथेर में रंग-बिरंगे परिधानों में कलाकार समूहों में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं।  नाटकों का प्रदर्शन करते हैं व्यंग और नकल उतारने हेतु इसमें हँसने-हँसाने को प्राथमिकता दी जाती है। संगीत के लिए सुरनाई, नगाड़ा और ढोल का प्रयोग किया जाता है। मूलतः भांड किसान होते हैं इसलिए इस नाट्यकला पर किसानों की संवेदनाओं का गहरा प्रभाव है। इस नाटकीय शैली में प्रयोग होने वाली शब्दावली का संबंध कश्मीर के  मध्ययुगीन और आधुनिक रहस्यवादियों के वखों और श्रुखों से है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी कई बार भांड पाथेर शैली की प्रस्तुती की गई है और इसे सराहा भी गया है। कुछ ऐसे पाथेर नाटक जो आज भी खुब पंसद किये जाते है। जो विभिन्न संगीत के साथ घटनाओं के कालक्रम को दर्शाते हैं।


भांड पाथेर दूसरे नाटकीय शैली से बिल्कुल अलग है। इसमें एक अकेला कलाकार नाटक करता है, नाचता  है और म्यूजिक बजाता है। इसमें किसी अन्य थिएटर की तरह बैकस्टेज साउंड या रिकॉर्डेड म्यूजिक शामिल नहीं होता है।  एक कलाकार जो कुछ भी करता है वह दर्शकों के सामने लाइव होता है। “कला उम्र से बंधी नहीं है। यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही है। प्रदर्शन करने वाले सभी कलाकार पुरुष होते हैं। किसी भी महिला भूमिका के लिए पुरुष कलाकार महिलाओं के कपड़े पहनकर ही नाटक करते है। भांड पाथेर पहले कश्मीरी शादियों में भी शामिल था । वाथोरा भांड पाथेर का केंद्र है।  कई परिवार अभी भी कला से जुड़े हुए हैं । नाटकों का आनंद लेने के लिए पर्यटक और शोधकर्ता अक्सर यहां आते जाते हैं । कश्मीर को अगर जानना पहचानना हो तो भांड पाथेर का नाटक देखना न भूले आपको सभी मुद्दो पर पारपंरिक नाटको का एक अनूठी प्रस्तुती की एक अनूठी शैली मिलेगी जो आपका मन मोह लेगी।
 

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