कश्मीर की घाटी में चैन से सोते लोग और पूरी रात जागता कंदूर

कश्मीर में पांच तरह की रोटियां है और इनका मजा तब ही लेना चाहिए जब आप कश्मीर में हो...ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर शहर में पुराने हिस्से में आज भी कई पारंपरिक बेकरी चल रही है...जिनका स्वाद आज भी वैसा ही है जैसा पहले हुआ करता था...कश्मीर में सुबह की शुरूआत एक गर्म नमकीन गुलाबी चाय के साथ होती है जिसे नन चाय कहते है....और ये तब तक अधूरा है जब तक उसके साथ पारंपरिक बेकरी जिसे कंदूर कहते है उससे निकली रोटी न हो....पूरी घाटी के लोग जब चैन से सो रहे होते है तो कंदूर जागता रहता है...और शुरू करता है अपना काम...2 बजे रात से...पहले तंदूर तैयार किया जाता है

 कश्मीर की घाटी में चैन से सोते लोग और पूरी रात जागता कंदूर

श्रीनगर:- कश्मीर का अपना एक अलग ही जायका है, और जायके का मजा देती है रोटी, यहां हर मौसम की अलग रोटी होती है, और कश्मीर के लोगों की सुबह इस रोटी के नाश्ते के साथ ही होती है लेकिन कहां से आती है ये रोटी और कितनी मेहनत है इसको बनाने में आज इसके बारे में हम आपको बताते है । कश्मीरी लोग खाने पीने के बहुत शौकिन होते है,और उनके सुबह की शुरूवात जिस खाने से होती है उसको रोटी कहते है।

कश्मीर में अलग अलग मौसम के लिए अलग ही रोटी होती है। सगाई, शादी, बच्चे के पैदा होने पर कोई जश्न हो या फिर कोई सामाजिक रीति-रिवाज हो यानि कहा जाये कि खाने पीने की कोई भी महफिल हो लेकिन रोटी की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है । कश्मीर में पांच तरह की रोटियां है और इनका मजा तब ही लेना चाहिए जब आप कश्मीर में हो, ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर शहर में पुराने हिस्से में आज भी कई पारंपरिक बेकरी चल रही है। जिनका स्वाद आज भी वैसा ही है जैसा पहले हुआ करता था।

कश्मीर में सुबह की शुरूआत एक गर्म नमकीन गुलाबी चाय के साथ होती है जिसे नन चाय कहते है, और ये तब तक अधूरा है जब तक उसके साथ पारंपरिक बेकरी जिसे कंदूर कहते है उससे निकली रोटी न हो, पूरी घाटी के लोग जब चैन से सो रहे होते है तो कंदूर जागता रहता है और शुरू करता है अपना काम.2 बजे रात से पहले तंदूर तैयार किया जाता है । फिर उसके लिए आग तैयार किया जाता है, कंदूर कश्मीर के सामाजिक जीवन का एक अनिर्वाय अंग है और हर इलाके में अपना एक अलग कंदूर होता है, जहां पर इलाके के सभी रहने वाले लोग कंदूर की दुकान से ही रोटी खरीदते है।

कंदूर की दुकान केवल एक दुकान नहीं है ये मेल मिलाप की एक बहुत बड़ा जरिया है, जहां हिन्दु भाई भी आते है और मुस्लिम भाई भी आते है और एक ही दुकान से कंदूर खरीदते है और इसी बहाने एक –दूसरे से मेल मिलाप भी कर लेते है । कंदूर से निकलने वाली रोटी की कई किस्में तैयार की जाती है। एक कुलचा हथेली के बराबर होता है और कुल्चे के भी दो प्रकार होते है मीठा और नमकीन दूसरी रोटी जाम या मक्खन के एक बड़े स्कूप के परोसी जाने वाली छोट उन लजीज रोटीयों में से एक है जो कश्मीर के लोगों को तब याद आती है जब वो कश्मीर से दूर होते है और उसका जायका उनकों बहुत याद आता है । डॉक्टर भी छोट की इस पारंपरिक रोटी को खाने की सलाह देते है ।

कुल्चा लवासा और फ्रुट से बनाया जाने वाला केक अब कश्मीरी ब्रेडमेकरों द्वारा बनाया जा रहा है। श्रीमल भी इस पारंपरिक रोटी की एक किस्म है जिसमें ड्राईफ्रूट का बहुत प्रयोग किया जाता है और इसको खास मौके जैसे शादी ब्याह में अक्सर बनाया और परोसा जाता है । ये सभी वो रोटियां है जिससे कश्मीर के लोगों के दिन की शुरूआत होती है और ये सभी उनकी सुबह शाम की चाय के साथी के रूप में हर घर में मिलती है । श्रीनगर में कंदूर की कई पारंपरिक दुकाने मिल जायेगी जहां पर ये पांच तरह की रोटी दुकानों पर आसानी से मिल जायेगी, तो कश्मीर में जब भी जाये तो यहां की इन रोटियों का मजा जरूर लें । 

 

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